Thursday, September 7, 2017

ओ देस से आने वाले बता - अख़्तर शीरानी

ओ देस से आने वाले बता
किस हाल में हैं यारान ए वतन
आवारा ए ग़ुर्बत को भी सुना किस रंग में है कनआन ए वतन
वो बाग़ ए वतन फ़िरदौस ए वतन वो सर्व ए वतन रेहान ए वतन
ओ देस से आने वाले बता

ओ देस से आने वाले बता
क्या अब भी वहाँ के बाग़ों में मस्ताना हवाएँ आती हैं
क्या अब भी वहाँ के पर्बत पर घनघोर घटाएँ छाती हैं
क्या अब भी वहाँ की बरखाएँ वैसे ही दिलों को भाती हैं
ओ देस से आने वाले बता

ओ देस से आने वाले बता
क्या अब भी वतन में वैसे ही सरमस्त नज़ारे होते हैं
क्या अब भी सुहानी रातों को वो चाँद सितारे होते हैं
हम खेल जो खेला करते थे क्या अब वही सारे होते हैं
ओ देस से आने वाले बता

ओ देस से आने वाले बता
क्या अब भी शफ़क़ के सायों में दिन रात के दामन मिलते हैं
क्या अब भी चमन में वैसे ही ख़ुशरंग शगूफ़े खिलते हैं
बरसाती हवा की लहरों से भीगे हुए पौदे हिलते हैं
ओ देस से आने वाले बता

ओ देस से आने वाले बता
शादाब ओ शगुफ़्ता फूलों से मामूर हैं गुलज़ार अब कि नहीं
बाज़ार में मालन लाती है फूलों के गुँधे हार अब कि नहीं
और शौक़ से टूटे पड़ते हैं नौउम्र ख़रीदार अब कि नहीं
ओ देस से आने वाले बता

ओ देस से आने वाले बता
क्या शाम पड़े गलियों में वही दिलचस्प अँधेरा होता है
और सड़कों की धुँदली शम्ओं पर सायों का बसेरा होता है
बाग़ों की घनेरी शाख़ों में जिस तरह सवेरा होता है
ओ देस से आने वाले बता

ओ देस से आने वाले बता
क्या अब भी वहाँ वैसी ही जवाँ और मदभरी रातें होती हैं
क्या रात भर अब भी गीतों की और प्यार की बातें होती हैं
वो हुस्न के जादू चलते हैं वो इश्क़ की घातें होती हैं
ओ देस से आने वाले बता

ओ देस से आने वाले बता
मीरानियों के आग़ोश में है आबाद वो बाज़ार अब कि नहीं
तलवारें बग़ल में दाबे हुए फिरते हैं तरहदार अब कि नहीं
और बहलियों में से झाँकते हैं तुर्कान ए सियहकार अब कि नहीं
ओ देस से आने वाले बता

ओ देस से आने वाले बता
क्या अब भी महकते मंदिर से नाक़ूस की आवाज़ आती है
क्या अब भी मुक़द्दस मस्जिद पर मस्ताना अज़ाँ थर्राती है
और शाम के रंगीं सायों पर अज़मत की झलक छा जाती है
ओ देस से आने वाले बता

ओ देस से आने वाला बता
क्या अब भी वहाँ के पनघट पर पनहारियाँ पानी भरती हैं
अंगड़ाई का नक़्शा बन बन कर सब माथे पे गागर धरती हैं
और अपने घरों को जाते हुए हँसती हुई चुहलें करती हैं
ओ देस से आने वाले बता

ओ देस से आने वाले बता
बरसात के मौसम अब भी वहाँ वैसे ही सुहाने होते हैं
क्या अब भी वहाँ के बाग़ों में झूले और गाने होते हैं
और दूर कहीं कुछ देखते ही नौउम्र दीवाने होते हैं
ओ देस से आने वाले बता

ओ देस से आने वाले बता
क्या अब भी पहाड़ी चोटियों पर बरसात के बादल छाते हैं
क्या अब भी हवा ए साहिल के वो रस भरे झोंके आते हैं
और सब से ऊँची टीकरी पर लोग अब भी तराने गाते हैं
ओ देस से आने वाले बता

ओ देस से आने वाले बता
क्या अब भी पहाड़ी घाटियों में घनघोर घटाएँ गूँजती हैं
साहिल के घनेरे पेड़ों में बरखा की हवाएँ गूँजती हैं
झींगुर के तराने जागते हैं मोरों की सदाएँ गूँजती हैं
ओ देस से आने वाले बता

ओ देस से आने वाले बता
क्या अब भी वहाँ मेलों में वही बरसात का जौबन होता है
फैले हुए बड़ की शाख़ों में झूलों का नशेमन होता है
उमडे हुए बादल होते हैं छाया हुआ सावन होता है
ओ देस से आने वाले बता

ओ देस से आने वाले बता
क्या शहर के गिर्द अब भी है रवाँ दरिया ए हसीं लहराए हुए
जूँ गोद में अपने मन को लिए नागिन हो कोई थर्राए हुए
या नूर की हँसली हूर की गर्दन में हो अयाँ बल खाए हुए
ओ देस से आने वाले बता

ओ देस से आने वाले बता
क्या अब भी वहाँ बरसात के दिन बाग़ों में बहारें आती हैं
मासूम ओ हसीं दोशीज़ाएँ बरखा के तराने गाती हैं
और तीतरियों की तरह से रंगीं झूलों पर लहराती हैं
ओ देस से आने वाले बता

ओ देस से आने वाले बता
क्या अब भी उफ़क़ के सीने पर शादाब घटाएँ झूमती हैं
दरिया के किनारे बाग़ों में मस्ताना हवाएँ झूमती हैं
और उन के नशीले झोंकों से ख़ामोश फ़ज़ाएँ झूमती हैं
ओ देस से आने वाले बता

ओ देस से आने वाले बता
क्या शाम को अब भी जाते हैं अहबाब कनार ए दरिया पर
वो पेड़ घनेरे अब भी हैं शादाब कनार ए दरिया पर
और प्यार से आ कर झाँकता है महताब कनार ए दरिया पर
ओ देस से आने वाले बता

ओ देस से आने वाले बता
क्या आम के ऊँचे पेड़ों पर अब भी वो पपीहे बोलते हैं
शाख़ों के हरीरी पर्दों में नग़्मों के ख़ज़ाने घोलते हैं
सावन के रसीले गीतों से तालाब में अमरस घोलते हैं
ओ देस से आने वाले बता

ओ देस से आने वाले बता
क्या पहली सी है मासूम अभी वो मदरसे की शादाब फ़ज़ा
कुछ भूले हुए दिन गुज़रे हैं जिस में वो मिसाल ए ख़्वाब फ़ज़ा
वो खेल वो हमसिन वो मैदाँ वो ख़्वाबगह ए महताब फ़ज़ा
ओ देस से आने वाले बता

ओ देस से आने वाले बता
क्या अब भी किसी के सीने में बाक़ी है हमारी चाह बता
क्या याद हमें भी करता है अब यारों में कोई आह बता
ओ देस से आने वाले बता लिल्लाह बता लिल्लाह बता
ओ देस से आने वाले बता

ओ देस से आने वाले बता
क्या हम को वतन के बाग़ों की मस्ताना फ़ज़ाएँ भूल गईं
बरखा की बहारें भूल गईं सावन की घटाएँ भूल गईं
दरिया के किनारे भूल गए जंगल की हवाएँ भूल गईं
ओ देस से आने वाले बता

ओ देस से आने वाले बता
क्या गाँव में अब भी वैसी ही मस्ती भरी रातें आती हैं
देहात की कमसिन माहवशें तालाब की जानिब जाती हैं
और चाँद की सादा रौशनी में रंगीन तराने गाती हैं
ओ देस से आने वाले बता

ओ देस से आने वाले बता
क्या अब भी गजरदम चरवाहे रेवड़ को चुराने जाते हैं
और शाम के धुँदले सायों के हमराह घरों को आते हैं
और अपनी रसीली बांसुरियों में इश्क़ के नग़्मे गाते हैं
ओ देस से आने वाले बता

ओ देस से आने वाले बता
क्या गाँव पे अब भी सावन में बरखा की बहारें छाती हैं
मासूम घरों से भोर भये चक्की की सदाएँ आती हैं
और याद में अपने मैके की बिछड़ी हुई सखियाँ गाती हैं
ओ देस से आने वाले बता

ओ देस से आने वाले बता
दरिया का वो ख़्वाबआलूदा सा घाट और उस की फ़ज़ाएँ कैसी हैं
वो गाँव वो मंज़र वो तालाब और उस की हवाएँ कैसी हैं
वो खेत वो जंगल वो चिड़ियाँ और उन की सदाएँ कैसी हैं
ओ देस से आने वाले बता

ओ देस से आने वाले बता
क्या अब भी पुराने खंडरों पर तारीख़ की इबरत तारी है
अन्नपूर्णा के उजड़े मंदिर पर मायूसी ओ हसरत तारी है
सुनसान घरों पर छावनी के वीरानी ओ रिक़्क़त तारी है
ओ देस से आने वाले बता

ओ देस से आने वाले बता
आख़िर में ये हसरत है कि बता वो ग़ारत ए ईमाँ कैसी है
बचपन में जो आफ़त ढाती थी वो आफ़त ए दौराँ कैसी है
हम दोनों थे जिस के परवाने वो शम ए शबिस्ताँ कैसी है
ओ देस से आने वाले बता

ओ देस से आने वाले बता
मरजाना था जिस का नाम बता वो ग़ुंचादहन किस हाल में है
जिस पर थे फ़िदा तिफ़्लान ए वतन वो जान ए वतन किस हाल में है
वो सर्व ए चमन वो रश्क ए समन वो सीमबदन किस हाल में है
ओ देस से आने वाले बता

ओ देस से आने वाले बता
क्या अब भी रुख़ ए गुलरंग पे वो जन्नत के नज़ारे रौशन हैं
क्या अब भी रसीली आँखों में सावन के सितारे रौशन हैं
ओ देस से आने वाले बता

ओ देस से आने वाले बता
क्या अब भी शहाबी आरिज़ पर गेसू ए सियह बिल खाते हैं
या बहर ए शफ़क़ की मौजों पर दो नाग पड़े लहराते हैं
और जिन की झलक से सावन की रातों के सपने आते हैं
ओ देस से आने वाले बता

ओ देस से आने वाले बता
अब नाम ए ख़ुदा होगी वो जवाँ मैके में है या ससुराल गई
दोशीज़ा है या आफ़त में उसे कमबख़्त जवानी डाल गई
घर पर ही रही या घर से गई ख़ुशहाल रही ख़ुशहाल गई
ओ देस से आने वाले बता

Sunday, August 27, 2017

दर्द आएगा दबे पाँव - फ़ैज़ अहमद फ़ैज़


और कुछ देर में जब फिर मेरे तन्हा दिल को
फ़िक्र आ लेगी कि तन्हाई का क्या चारा करे
दर्द आएगा दबे पाँव लिए सुर्ख़ चराग़
वो जो इक दर्द धड़कता है कहीं दिल से परे

शोला ए दर्द जो पहलू में लपक उट्ठेगा
दिल की दीवार पे हर नक़्श दमक उट्ठेगा
हल्क़ा ए ज़ुल्फ़ कहीं गोशा ए रुख़्सार कहीं
हिज्र का दश्त कहीं गुलशन ए दीदार कहीं
लुत्फ़ की बात कहीं प्यार का इक़रार कहीं

दिल से फिर होगी मेरी बात कि ऐ दिल ऐ दिल
ये जो महबूब बना है तेरी तन्हाई का
ये तो मेहमाँ है घड़ी भर का चला जाएगा
उस से कब तेरी मुसीबत का मदावा होगा
मुश्तइल हो के अभी उट्ठेंगे वहशी साए
ये चला जाएगा रह जाएँगे बाक़ी साए
रात भर जिन से तेरा ख़ून ख़राबा होगा

जंग ठहरी है कोई खेल नहीं है ऐ दिल
दुश्मन ए जाँ हैं सभी सारे के सारे क़ातिल
ये कड़ी रात भी ये साए भी तन्हाई भी
दर्द और जंग में कुछ मेल नहीं है ऐ दिल
लाओ सुलगाओ कोई जोश ए ग़ज़ब का अँगार
तैश की आतिश ए जर्रार कहाँ है लाओ
वो दहकता हुआ गुलज़ार कहाँ है लाओ

जिस में गर्मी भी है हरकत भी तवानाई भी
हो न हो अपने क़बीले का भी कोई लश्कर
मुंतज़िर होगा अंधेरे की फ़सीलों के उधर
उन को शोलों के रजज़ अपना पता तो देंगे
ख़ैर हम तक वो न पहुँचे भी सदा तो देंगे
दूर कितनी है अभी सुबह बता तो देंगे

Monday, July 24, 2017

अंदेशा - कफ़ील आज़र

बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी
लोग बेवजह उदासी का सबब पूछेंगे
ये भी पूछेंगे कि तुम इतनी परेशाँ क्यूँ हो
जगमगाते हुए लम्हों से गुरेज़ाँ क्यूँ हो
उँगलियाँ उट्ठेंगी सूखे हुए बालों की तरफ़
इक नज़र देखेंगे गुज़रे हुए सालों की तरफ़
चूड़ियों पर भी कई तंज़ किए जाएँगे
काँपते हाथों पे भी फ़िक़रे कसे जाएँगे
फिर कहेंगे कि हँसी में भी ख़फ़ा होती हैं
अब तो रूही की नमाज़ें भी क़ज़ा होती हैं
लोग ज़ालिम हैं हर इक बात का ताना देंगे
बातों बातों में मेरा ज़िक्र भी ले आएँगे
इन की बातों का ज़रा सा भी असर मत लेना
वर्ना चेहरे के तास्सुर से समझ जाएँगे
चाहे कुछ भी हो सवालात न करना उन से
मेरे बारे में कोई बात न करना उन से
बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी

Friday, July 14, 2017

मुझसे पहली सी मुहब्बत - फ़ैज़

मुझसे पहली सी मोहब्बत मेरी महबूब न माँग
मैंने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात
तेरा ग़म है तो ग़म ए दहर का झगड़ा क्या है
तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात
तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है
तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूँ हो जाए
यूँ न था, मैंने फ़क़त चाहा था यूँ हो जाए

और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा

अनगिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिस्म
रेशम ओ अतलस ओ किमख़्वाब में बुनवाए हुए
जा ब जा बिकते हुए कूचा ओ बाज़ार में जिस्म
ख़ाक में लुथड़े हुए ख़ून में नहलाए हुए
जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से
पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से
लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे
अब भी दिलकश है तेरा हुस्न मगर क्या कीजे

और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा
मुझ से पहली सी मोहब्बत मेरी महबूब न माँग

Sunday, May 28, 2017

ख़त - परवीन शाक़िर

जान से प्यारे
कुछ दिनों से बहुत याद आने लगे हो
तुम्हारा बिछड़ना तो तुम्हारे मिलने से बढ़कर
तुम्हें मेरे नज़दीक लाने लगा है

मैं हर वक़्त ख़ुद को
तुम्हारे जवां बाज़ुओं में पिघलते देखती हूँ
मेरे होंठ अब तक
तुम्हारी मुहब्बत से नम हैं
तुम्हारा ये कहना गलत तो न था कि
मेरे लब तुम्हारे लबों के सबब ही गुलनार हैं

तो ख़ुश हो
अब तो मेरे आईने का भी यही कहना है कि
मैं हर बार बालों में कंघी अधूरी ही कर पाती हूँ
क्या करूँ आख़िर
तुम्हारी मुहब्बत भरी उंगलियाँ रोक लेती हैं मुझको
अब मैं मानती जा रही हूँ
मेरे अंदर की सारी रातें और बाहर के मौसम
तुम्हारे सबब से थे तुम्हारे लिए थे

जवाबन
ख़िजां मुझमें चाहोगे देखना
या कि फ़स्ल ए बहारां
कोई भी फ़ैसला हो तुम्हारा
मंज़ूर है
मगर, जल्द कर दो तो अच्छा है

तुम्हारी, फ़क़त तुम्हारी.... परवीन शाक़िर

Sunday, May 21, 2017

इन्तज़ार - मख़्दूम मोहिउद्दीन

रात भर दीद ए नमनाक में लहराते रहे
सांस की तरह से आप आते रहे जाते रहे

ख़ुश थे हम अपनी तमन्नाओं का ख़्वाब आएगा
अपना अरमान बर अफगन्दा नक़ाब आएगा
नज़रें नीची किए शरमाए हुए आएगा
काकुले चेहरे पे बिखराए हुए आएगा
आ गई थी दिल ए मुज़्तर में शकेबाई सी
बज रही थी मेरे ग़मखाने में शहनाई सी
पत्तियाँ खड़कीं तो समझा कि लो आप आ ही गए
सजदे मसरूर के मसजूद को हम पा ही गए

शब के जागे हुए तारों को भी नींद आने लगी
आपके आने की एक आस थी अब जाने लगी
सुबह ने सेज से उठते हुए ली अंगड़ाई
ओ सबा तू भी जो आई तो अकेली आई
मेरे महबूब मेरी नींद उड़ाने वाले
मेरे मसजूद मेरी रूह पे छाने वाले
आ भी जा ताकि मेरे सजदों का अरमाँ निकले
आ भी जा ताकि तेरे क़दमो पे मेरी जाँ निकले

Friday, May 12, 2017

तुम्हारे हुस्न के नाम - फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

सलाम लिखता है शायर तुम्हारे हुस्न के नाम

बिखर गया जो कभी रंग ए पैरहन सर ए बाम
निखर गई है कभी सुबह दोपहर कभी शाम
कहीं जो क़ामत ए ज़ेबा पे सज गई है क़बा
चमन में सर्व ओ सनोबर सँवर गए हैं तमाम
बनी बिसात ए ग़ज़ल जब डुबो लिए दिल ने
तुम्हारे साया ए रुख़सार ओ लब में साग़र ओ जाम
सलाम लिखता है शायर तुम्हारे हुस्न के नाम

तुम्हारे हाथ पे है ताबिश ए हिना जब तक
जहाँ में बाक़ी है दिलदारी ए उरूस ए सुख़न
तुम्हारा हुस्न जवाँ है तो मेहरबाँ है फ़लक
तुम्हारा दम है तो दमसाज़ है हवा ए वतन
अगरचे तंग हैं औक़ात सख़्त हैं आलाम
तुम्हारी याद से शीरीं है तल्ख़ी ए अय्याम
सलाम लिखता है शायर तुम्हारे हुस्न के नाम