कब तलक ख़्वाबों से धोका खाओगी
कब तलक स्कूल के बच्चों से दिल बहलाओगी
कब तलक मुन्ना से शादी के करोगी तज़्किरे
ख़्वाहिशों की आग में जलती रहोगी कब तलक
छुट्टियों में कब तलक हर साल दिल्ली जाओगी
कब तलक शादी के हर पैग़ाम को ठुकराओगी
चाय में पड़ता रहेगा और कितने दिन नमक
बंद कमरे में पढ़ोगी और कितने दिन ख़ुतूत
ये उदासी कब तलक
कब तलक नज़्में लिखोगी
रोओगी यूँ रात की ख़ामोशियों में कब तलक
बाइबल में कब तलक ढूँढोगी ज़ख़्मों का इलाज
मुस्कुराहट में छुपाओगी कहाँ तक अपने ग़म
कब तलक पूछोगी टेलीफ़ोन पर मेरा मिज़ाज
फ़ैसला कर लो कि किस रस्ते पे चलना है तुम्हें
मेरी बाँहों में सिमटना है हमेशा के लिए
या हमेशा दर्द के शोलों में जलना है तुम्हें
कब तलक ख़्वाबों से धोके खाओगी
Thursday, November 30, 2017
दोराहे - कफ़ील आज़र
Sunday, November 19, 2017
नज़्म - साक़ी फ़ारूक़ी
ऐ दिल पहले भी तन्हा थे ऐ दिल हम तन्हा आज भी हैं
और उन ज़ख़्मों और दाग़ों से अब अपनी बातें होती हैं
जो ज़ख़्म कि सुर्ख़ गुलाब हुए जो दाग़ कि बदर ए मुनीर हुए
इस तरह से कब तक जीना है मैं हार गया इस जीने से
कोई अब्र उड़े किसी क़ुल्ज़ुम से रस बरसे मेरे वीराने पर
कोई जागता हो कोई कुढ़ता हो मेरे देर से वापस आने पर
कोई साँस भरे मेरे पहलू में कोई हाथ धरे मेरे शाने पर
और दबे दबे लहजे में कहे तुमने अब तक बड़े दर्द सहे
तुम तन्हा तन्हा जलते रहे तुम तन्हा तन्हा चलते रहे
सुनो तन्हा चलना खेल नहीं चलो आओ मेरे हमराह चलो
चलो नए सफ़र पर चलते हैं चलो मुझे बना के गवाह चलो
Monday, November 13, 2017
नज़्म - अमजद इस्लाम अमजद
मुहब्बत की तबियत में ये कैसा बचपना क़ुदरत ने रक्खा है
कि ये जितनी पुरानी जितनी मजबूत हो जाए
इसे ताईद ए ताज़ा की ज़रूरत फिर भी रहती है
यकीं की आख़िरी हद तक दिलों में लहलहाती है
निगाहों से टपकती हो, लहू में जगमगाती हो
हज़ारों तरह के दिलकश हसीं हाले बनाती हो
इसे इज़हार के लफ़्ज़ों की हाज़त फिर भी रहती है
मुहब्बत माँगती है यूँ गवाही अपने होने की
कि जैसे तिफ़्ल ए सादा शाम को इक बीज बोयें
और शब में बारहा उट्ठे
ज़मीं को खोद कर देखे, कि पौधा कहाँ तक है
मुहब्बत की तबियत में अजब तक़रार की खू है
कि ये इक़रार के लफ़्ज़ों को सुनने से नहीं थकती
बिछड़ने की घड़ी हो या कोई मिलने की साअत हो
इसे बस एक ही धुन है
कहो मुझसे मुहब्बत है, कहो मुझसे मुहब्बत है
तुम्हें मुझसे मुहब्बत है
समन्दर से कहीं गहरी, सितारों से सिवा रोशन
पहाड़ों की तरह क़ायम, हवाओं की तरह दायम
ज़मीं से आसमां तक जिस क़दर अच्छे मनाज़िर हैं
मुहब्बत के कमाए हैं वफ़ा के इस्तआरे हैं
हमारे वास्ते ये चाँदनी रातें सँवरती हैं
सुनहरा दिन निकलता है
मुहब्बत जिस तरफ़ जाए ज़माना साथ चलता है
कुछ ऐसी बेसुकूनी है वफ़ा की सरज़मींनों में
कि जो अहल ए मुहब्बत को सदा बेचैन रखती है
कि जैसे फूल में ख़ुशबू, कि जैसे हाथ में पारा
कि जैसे शाम का तारा
मुहब्बत करने वालों की सहर रातों में रहती है
गुमाँ के शाखचों में आशियाँ बनता है उल्फ़त का
ये आईन ए वस्ल में भी हिज्र के ख़दशों में रहती है
मुहब्बत के मुसाफ़िर ज़िन्दगी जब काट चुकते हैं
थकन की किरचियाँ चुनते वफ़ा की अज़रकें पहने
समय की रहगुज़र की आख़िरी सरहद पे रुकते हैं
तो कोई डूबती साँसों की डोरी थाम कर
धीरे से कहता है
ये सच है ना
हमारी ज़िंदगी इक दूसरे के नाम लिक्खी थी
धुँधलका से जो आँखों के क़रीब ओ दूर फैला है
इसी का नाम चाहत है
तुम्हें मुझसे मुहब्बत थी
तुम्हें मुझसे मुहब्बत है
मुहब्बत की तबियत में ये कैसा बचपना क़ुदरत ने रक्खा है
Sunday, October 29, 2017
नज़्म - अमजद इस्लाम अमजद
अगर कभी मेरी याद आए
तो चाँद रातों की नर्म दिलगीर रौशनी में
किसी सितारे को देख लेना
अगर वो नख़्ल ए फ़लक से उड़ कर
तुम्हारे क़दमों में आ गिरे तो ये जान लेना
वो इस्तिआरा था मेरे दिल का
अगर न आए
मगर ये मुमकिन ही किस तरह है
कि तुम किसी पर निगाह डालो
तो उस की दीवार ए जाँ न टूटे
वो अपनी हस्ती न भूल जाए
अगर कभी मेरी याद आए
गुरेज़ करती हवा की लहरों पे हाथ रखना
मैं ख़ुशबुओं में तुम्हें मिलूँगा
मुझे गुलाबों की पत्तियों में तलाश करना
मैं ओसक़तरों के आईनों में तुम्हें मिलूँगा
अगर सितारों में ओसक़तरों में ख़ुशबुओं में न पाओ मुझ को
तो अपने क़दमों में देख लेना
मैं गर्द होती मसाफ़तों में तुम्हें मिलूँगा
कहीं पे रौशन चराग़ देखो तो जान लेना
कि हर पतंगे के साथ मैं भी बिखर चुका हूँ
तुम अपने हाथों से उन पतंगों की ख़ाक दरिया में डाल देना
मैं ख़ाक बन कर समुंदरों में सफ़र करूँगा
किसी न देखे हुए जज़ीरे पे रुक के तुम को सदाएँ दूँगा
समुंदरों के सफ़र पे निकलो
तो उस जज़ीरे पे भी उतरना
Wednesday, October 18, 2017
ग़मगीन याद - मजाज़ लखनवी
मेरे पहलू ब पहलू जब वो चलती थी गुलिस्ताँ में
फ़राज़ ए आसमाँ पर कहकशाँ हसरत से तकती थी
मोहब्बत जब चमक उठती थी उस की चश्म ए ख़ंदाँ में
ख़मिस्तान ए फ़लक से नूर की सहबा छलकती थी
मेरे बाज़ू पे जब वो ज़ुल्फ़ ए शबगूँ खोल देती थी
ज़माना निकहत ए ख़ुल्द ए बरीं में डूब जाता था
मेरे शाने पे जब सर रख के ठंडी साँस लेती थी
मेरी दुनिया में सोज़-ओ-साज़ का तूफ़ान आता था
वो मेरा शेर जब मेरी ही लय में गुनगुनाती थी
मनाज़िर झूमते थे बाम ओ दर को वज्द आता था
मेरी आँखों में आँखें डाल कर जब मुस्कुराती थी
मेरे ज़ुल्मतकदे का ज़र्रा ज़र्रा जगमगाता था
उमड़ आते थे जब अश्क ए मोहब्बत उस की पलकों तक
टपकती थी दर ओ दीवार से शोख़ी तबस्सुम की
जब उस के होंट आ जाते थे अज़ ख़ुद मेरे होंटों तक
झपक जाती थीं आँखें आसमाँ पर माह ओ अंजुम की
वो जब हंगाम ए रुख़्सत देखती थी मुझको मुड़ मुड़ कर
तो ख़ुद फ़ितरत के दिल में महशर ए जज़्बात होता था
वो महव ए ख़्वाब जब होती थी अपने नर्म बिस्तर पर
तो उसके सर पे मरियम का मुक़द्दस हाथ होता था
ख़बर क्या थी कि वो इक रोज़ मुझ को भूल जाएगी
और उस की याद मुझ को ख़ून के आँसू रुलाएगी
Monday, October 16, 2017
उसकी बातें उदास कर देंगी
अपनी तन्हाईयों से पूछा है
शब ए हिज्रां से बात कर ली है
मेरे अंदर की सहमी ख़ामोशी
मेरे बाहर का हँसता चेहरा भी
रात के सनसनाते लम्हें भी
दिन का डसता हुआ उजाला भी
ज़ब्त का टूटता ये बंधन भी
सब्र का छूटता ये दामन भी
उसकी यादें भी कुछ इशारों में
मुझको मजबूर कर रहे हैं सब
आओ सब उसके पास चलते हैं
उससे कहते हैं कुछ दवा कर दो
अपनी फ़ितरत को छोड़ कर इक पल
कोई वादा तो तुम वफ़ा कर दो
इनकी बातों से कुछ नहीं होगा
आख़िरी फ़ैसला तो दिल का है
दिल ये कहता है उससे मिलने से
अपनी तन्हाईयाँ ही अच्छी हैं
अब अकेले में लग गया है दिल
उससे मिलने हमें नहीं जाना
उसकी बातें उदास कर देंगी
Friday, October 13, 2017
किसी का क्या बिगड़ जाता - नज़्म
किसी का क्या बिगड़ जाता
अगर हम एक हो जाते
हमेशा की तरह सूरज तुलू मशरिक़ से ही होता
हमेशा की तरह रातों में तारे जगमगाते और
बहारों में गुल ओ बुलबुल महकते, चहचहाते हाँ
किसी का क्या बिगड़ जाता
किसी का क्या बिगड़ जाता
न मैं फिरता यक ओ तन्हा
न तुम गुमसुम रहा करतीं
न जीवन में कमी रहती
न आंखों में नमी रहती
न मौसम रूठते हमसे
न रोज़ ओ शब गराँ होते
गुज़रते पल यूँ हैरत से हमें देखा नहीं करते
अगर हम एक हो जाते
अगर हम एक हो जाते
तो रूहों में बसी है जो
अज़ल की प्यास न रहती
ख़लिश सी ज़िंदगी में फिर
पस ए एहसास न रहती
कोई हसरत नहीं रहती
कोई भी आस न रहती
उदासी यास न रहती
किसी का क्या बिगड़ जाता
अगर हम एक हो जाते