Monday, July 24, 2017

अंदेशा - कफ़ील आज़र

बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी
लोग बेवजह उदासी का सबब पूछेंगे
ये भी पूछेंगे कि तुम इतनी परेशाँ क्यूँ हो
जगमगाते हुए लम्हों से गुरेज़ाँ क्यूँ हो
उँगलियाँ उट्ठेंगी सूखे हुए बालों की तरफ़
इक नज़र देखेंगे गुज़रे हुए सालों की तरफ़
चूड़ियों पर भी कई तंज़ किए जाएँगे
काँपते हाथों पे भी फ़िक़रे कसे जाएँगे
फिर कहेंगे कि हँसी में भी ख़फ़ा होती हैं
अब तो रूही की नमाज़ें भी क़ज़ा होती हैं
लोग ज़ालिम हैं हर इक बात का ताना देंगे
बातों बातों में मेरा ज़िक्र भी ले आएँगे
इन की बातों का ज़रा सा भी असर मत लेना
वर्ना चेहरे के तास्सुर से समझ जाएँगे
चाहे कुछ भी हो सवालात न करना उन से
मेरे बारे में कोई बात न करना उन से
बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी

Friday, July 14, 2017

मुझसे पहली सी मुहब्बत - फ़ैज़

मुझसे पहली सी मोहब्बत मेरी महबूब न माँग
मैंने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात
तेरा ग़म है तो ग़म ए दहर का झगड़ा क्या है
तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात
तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है
तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूँ हो जाए
यूँ न था, मैंने फ़क़त चाहा था यूँ हो जाए

और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा

अनगिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिस्म
रेशम ओ अतलस ओ किमख़्वाब में बुनवाए हुए
जा ब जा बिकते हुए कूचा ओ बाज़ार में जिस्म
ख़ाक में लुथड़े हुए ख़ून में नहलाए हुए
जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से
पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से
लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे
अब भी दिलकश है तेरा हुस्न मगर क्या कीजे

और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा
मुझ से पहली सी मोहब्बत मेरी महबूब न माँग

Sunday, May 28, 2017

ख़त - परवीन शाक़िर

जान से प्यारे
कुछ दिनों से बहुत याद आने लगे हो
तुम्हारा बिछड़ना तो तुम्हारे मिलने से बढ़कर
तुम्हें मेरे नज़दीक लाने लगा है

मैं हर वक़्त ख़ुद को
तुम्हारे जवां बाज़ुओं में पिघलते देखती हूँ
मेरे होंठ अब तक
तुम्हारी मुहब्बत से नम हैं
तुम्हारा ये कहना गलत तो न था कि
मेरे लब तुम्हारे लबों के सबब ही गुलनार हैं

तो ख़ुश हो
अब तो मेरे आईने का भी यही कहना है कि
मैं हर बार बालों में कंघी अधूरी ही कर पाती हूँ
क्या करूँ आख़िर
तुम्हारी मुहब्बत भरी उंगलियाँ रोक लेती हैं मुझको
अब मैं मानती जा रही हूँ
मेरे अंदर की सारी रातें और बाहर के मौसम
तुम्हारे सबब से थे तुम्हारे लिए थे

जवाबन
ख़िजां मुझमें चाहोगे देखना
या कि फ़स्ल ए बहारां
कोई भी फ़ैसला हो तुम्हारा
मंज़ूर है
मगर, जल्द कर दो तो अच्छा है

तुम्हारी, फ़क़त तुम्हारी.... परवीन शाक़िर

Sunday, May 21, 2017

इन्तज़ार - मख़्दूम मोहिउद्दीन

रात भर दीद ए नमनाक में लहराते रहे
सांस की तरह से आप आते रहे जाते रहे

ख़ुश थे हम अपनी तमन्नाओं का ख़्वाब आएगा
अपना अरमान बर अफगन्दा नक़ाब आएगा
नज़रें नीची किए शरमाए हुए आएगा
काकुले चेहरे पे बिखराए हुए आएगा
आ गई थी दिल ए मुज़्तर में शकेबाई सी
बज रही थी मेरे ग़मखाने में शहनाई सी
पत्तियाँ खड़कीं तो समझा कि लो आप आ ही गए
सजदे मसरूर के मसजूद को हम पा ही गए

शब के जागे हुए तारों को भी नींद आने लगी
आपके आने की एक आस थी अब जाने लगी
सुबह ने सेज से उठते हुए ली अंगड़ाई
ओ सबा तू भी जो आई तो अकेली आई
मेरे महबूब मेरी नींद उड़ाने वाले
मेरे मसजूद मेरी रूह पे छाने वाले
आ भी जा ताकि मेरे सजदों का अरमाँ निकले
आ भी जा ताकि तेरे क़दमो पे मेरी जाँ निकले

Friday, May 12, 2017

तुम्हारे हुस्न के नाम - फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

सलाम लिखता है शायर तुम्हारे हुस्न के नाम

बिखर गया जो कभी रंग ए पैरहन सर ए बाम
निखर गई है कभी सुबह दोपहर कभी शाम
कहीं जो क़ामत ए ज़ेबा पे सज गई है क़बा
चमन में सर्व ओ सनोबर सँवर गए हैं तमाम
बनी बिसात ए ग़ज़ल जब डुबो लिए दिल ने
तुम्हारे साया ए रुख़सार ओ लब में साग़र ओ जाम
सलाम लिखता है शायर तुम्हारे हुस्न के नाम

तुम्हारे हाथ पे है ताबिश ए हिना जब तक
जहाँ में बाक़ी है दिलदारी ए उरूस ए सुख़न
तुम्हारा हुस्न जवाँ है तो मेहरबाँ है फ़लक
तुम्हारा दम है तो दमसाज़ है हवा ए वतन
अगरचे तंग हैं औक़ात सख़्त हैं आलाम
तुम्हारी याद से शीरीं है तल्ख़ी ए अय्याम
सलाम लिखता है शायर तुम्हारे हुस्न के नाम

Saturday, January 14, 2017

औरत - कैफ़ी आज़मी

उठ मेरी जान मेरे साथ ही चलना है तुझे

कल्ब ए माहौल में लरज़ाँ शरर ए जंग हैं आज
हौसले वक़्त के और ज़ीस्त के यक रंग हैं आज
आबगीनों में तपां वलवला ए संग हैं आज
हुस्न और इश्क हम आवाज़ हमआहंग हैं आज
जिसमें जलता हूँ उसी आग में जलना है तुझे
उठ मेरी जान मेरे साथ ही चलना है तुझे

ज़िन्दगी जहद में है सब्र के काबू में नहीं
नब्ज़ ए हस्ती का लहू कांपते आँसू में नहीं
उड़ने खुलने में है निकहत ख़म ए गेसू में नहीं
जन्नत इक और है जो मर्द के पहलू में नहीं
उसकी आज़ाद रविश पर भी मचलना है तुझे
उठ मेरी जान मेरे साथ ही चलना है तुझे

गोशे गोशे में सुलगती है चिता तेरे लिये
फ़र्ज़ का भेस बदलती है क़ज़ा तेरे लिये
क़हर है तेरी हर इक नर्म अदा तेरे लिये
ज़हर ही ज़हर है दुनिया की हवा तेरे लिये
रुत बदल डाल अगर फूलना फलना है तुझे
उठ मेरी जान मेरे साथ ही चलना है तुझे

क़द्र अब तक तिरी तारीख़ ने जानी ही नहीं
तुझ में शोले भी हैं बस अश्कफ़िशानी ही नहीं
तू हक़ीक़त भी है दिलचस्प कहानी ही नहीं
तेरी हस्ती भी है इक चीज़ जवानी ही नहीं
अपनी तारीख़ का उनवान बदलना है तुझे
उठ मेरी जान मेरे साथ ही चलना है तुझे

तोड़ कर रस्म के बुत बन्द ए क़दामत से निकल
ज़ोफ़ ए इशरत से निकल वहम ए नज़ाकत से निकल
नफ़स के खींचे हुये हल्क़ा ए अज़मत से निकल
क़ैद बन जाये मुहब्बत तो मुहब्बत से निकल
राह का ख़ार ही क्या गुल भी कुचलना है तुझे
उठ मेरी जान मेरे साथ ही चलना है तुझे

तोड़ ये अज़्म शिकन दग़दग़ा ए पन्द भी तोड़
तेरी ख़ातिर है जो ज़ंजीर वह सौगंध भी तोड़
तौक़ यह भी है ज़मर्रूद का गुल बन्द भी तोड़
तोड़ पैमाना ए मरदान ए ख़िरदमन्द भी तोड़
बन के तूफ़ान छलकना है उबलना है तुझे
उठ मेरी जान मेरे साथ ही चलना है तुझे

तू फ़लातून व अरस्तू है तू ज़ोहरा परवीं
तेरे क़ब्ज़े में ग़रदूँ तेरी ठोकर में ज़मीं
हाँ उठा जल्द उठा पा ए मुक़द्दर से ज़बीं
मैं भी रुकने का नहीं वक़्त भी रुकने का नहीं
लड़खड़ाएगी कहाँ तक कि संभलना है तुझे
उठ मेरी जान मेरे साथ ही चलना है तुझे

अंदेशे - कैफ़ी आज़मी

रूह बेचैन है इक दिल की अज़ीयत क्या है
दिल ही शोला है तो ये सोज़ ए मोहब्बत क्या है
वो मुझे भूल गई इसकी शिकायत क्या है
रंज तो ये है के रो रो के भुलाया होगा

वो कहाँ और कहाँ काहिफ़ ए ग़म सोज़िश ए जाँ
उस की रंगीन नज़र और नुक़ूश ए हिरमा
उस का एहसास ए लतीफ़ और शिकस्त ए अरमा
तानाज़न एक ज़माना नज़र आया होगा

झुक गई होगी जवाँ साल उमंगों की जबीं
मिट गई होगी ललक डूब गया होगा यक़ीं
छा गया होगा धुआँ घूम गई होगी ज़मीं
अपने पहले ही घरोंदे को जो ढाया होगा

दिल ने ऐसे भी कुछ अफ़साने सुनाये होंगे
अश्क आँखों ने पिये और न बहाये होंगे
बन्द कमरे में जो ख़त मेरे जलाये होंगे
इक इक हर्फ़ जबीं पर उभर आया होगा

उस ने घबरा के नज़र लाख बचाई होगी
मिट के इक नक़्श ने सौ शक़्ल दिखाई होगी
मेज़ से जब मेरी तस्वीर हटाई होगी
हर तरफ़ मुझ को तड़पता हुआ पाया होगा

बेमहल छेड़ पे जज़्बात उबल आये होंगे
ग़म पशेमा तबस्सुम में ढल आये होंगे
नाम पर मेरे जब आँसू निकल आये होंगे
सर न काँधे से सहेली के उठाया होगा

ज़ुल्फ़ ज़िद कर के किसी ने जो बनाई होगी
रूठे जलवों पे ख़िज़ाँ और भी छाई होगी
बर्क़ आँखों ने कई दिन न गिराई होगी
रंग चेहरे पे कई रोज़ न आया होगा

होके मजबूर मुझे उस ने भुलाया होगा
ज़हर चुप कर के दवा जान के ख़ाया होगा